Wednesday, April 16, 2008

भीड़

किसी ने था दामन खींचा और किसी ने सर से था घसीटा
हाथ कई उस पर पड़े थे ,कई लातो ने ठोकर जड़े थे
बस कसूर एक ही था उसका ,अबला थी -अकेली थी वो
कोशिश कर रही थी ज़िंदा रखने की
अपने अस्तित्वा को
अकेले ही ,अपने दम पर ,बिना किसी सरमाये के ....

"आप बस नाम बताइए सज़ा हम दिलवाएँगे
इसकी तार तार हुईअस्मत पर
इंसाफ़ का साफ़ा हम पहनाएँगे "

क्या बताए दारोगा बाबू
भीड़ की शक्ल तो नही होती
हाथ वो थे जो पाक दामन को छू ना पाए थे पहले
थी ज़ुबाने वो जिनकीछींटाकसी बेअसर थी पहले
आँखे वो थी जो हया से पारहुई जाती थी
रूह वो थी जो दफ़्न हो चुकी थीबेकासी के तमाशे के नीचे

दे सके तो हिम्मत दे अभागी को , दे सके तो दे विश्वास इसे
कि इंसानियत अभी भी ज़िंदा हे, इन्साफ यहाँ मिलता है

मैं एक अजनबी हूँ चलता हू ....
होश मे आए तो इसे कहना
भीड़ से निकले इक इंसान ने छोटी सी कोशिश कि थी
इंसानियत के पाक दामन से छींटो को कम करने की
हो इसका खुदा हाफिज़ हे यही दुआ मेरी







Friday, January 25, 2008

मैं .....कौन.....पथ पर ...

कारवाँ गुज़र गये
मैं कही नही गया
बीती सदियान कई
था वक़्त मेरा थम गया ....

कितने राज पाट देखे
राजा बन फकीर देखे
फ़ासले घटते रहे
तूफान भी गुज़र चले
पर था खड़ा जहाँ
मैं कभी नही हिला .....

मैं.....मील का पत्थर...
गुज़रे इतिहास का गवाह...

रास्तो के किनारे पे
आज भी वहीं खड़ा
जहाँ मैं गाड़ा गया था
कई सदियों पहले बन निशाँ .....

बन इत्तिहास का मौन गवाह
मैं... मील का पत्थर.....
मैं....मौन दर्शक......
मैं ....मूक श्रोता .......

Friday, January 11, 2008

कोई अनजाना सा .....

एक अनोखा सा भाव हे जों
हर पल महसूस हुए मुझको
तेरे आने की हर आहट पर
मॅन कहता हे ऐसे कुछ तो

अब तक तो मैंने सबसे
रक्खा था छुपा के तुझको
तू सोचे वही जों मैं सोचूं
तू समझे वही जों मैं कह दूँ

जिस दिन से हम तुम है जुडे
मैंने है दिए तुझे संस्कार मेरे
अपने कोख की परतों में
अपने ख्वाबो की बस्ती में......

एक अनजाना भय है फिर भी
आ आ के सताता हे पल छिन
क्या तू बन पायेगा
जों चाहे बनाना मेरा दिल

क्या इस दुनिया के रंगो में
रंग जाएगा तू भी इक दिन
या फिर मेरे नक्शे कदम पे
रख पायेगा अपने पद चिह्न .....

पर मेरे बच्चे है मुझे यकीन
तू होगा इक कच्ची मिटटी
गड़ पाऊँगी अपने रंग ढंग में
गड़ पाऊँगी में तेरी हस्ती

आखिर तेरा मेरा रिश्ता था जुडा
दुनिया से महीनों पहले का
अब नही कोई डर इस दिल में
बस है इक आस तन मन में
है एक इंतज़ार.......

....तुझे भर अपनी बाहों में
सुनाऊं लोरिया कानो में
मेरे नन्हें सपने ,
मेरे अन्जन्मे मुन्ने .

Monday, January 07, 2008

कल् रात भर ....

सर्द मौसम से दामन बचाते ही

रजाई गिलाफो में खुद को छुपाते ही

काफ़ी की गरमा गरम चुस्की लगाते ही

यूं ही अचानक....

तेरी याद आ के सताती रही...

कल् रात भर.....



याद हे तुमको, हॉस्टल की छत पर

रिमझिम सौंधी हलकी बारिश में

गर्म काफ़ी के मग भर लेकर

कितनी शामें काटी थी

यूं ही ..ऐवें ही ....बतियाते हुए

शाम भर....सुबाह तक॥


तुझसे बांटे वो फलसफे

मेरे जीने का सबब हे अब तक .....


मेरी दोस्त और हमराज़ थी तुम

साँझे गम की हमसाज़ थी हम
फिर छोड़ गयी यूं अचानक

मेरे मॅन के कैनवास को

खाली ...सफ़ेद ....सपाट तुम

हमने वादे किये थे

दोस्ती निभाने के उम्र तमाम

पर तुम निकली दगाबाज ...

यू गयी छोड़ मुझे तनहा बेसाज़



कल् का ही दिन था न वो

बहुत साल पहले जब..

.मेरी बाहों में सर रख के

तुमने कहे थे आखिरी शब्द

"मुस्कराहट तेरे लबों से

कभी कहीं न बिचडे...

सदा खुश रहना मेरी दोस्त....."



मैंने अपने वादा निभाया,

खुशी को सदा गले से लगाया

आंसुओं ने न साथ दिया पर ..

तेरी याद आ आके सताती रही

कल् रात भर......

Saturday, October 06, 2007

आत्म-........

वो सड़क पर पड़ा था
पसीने से तराबोर
ख़ून से लथपथ
असहाय निराधार

कुछ ने मुह फेर लिया
कईयों ने बस घेर लिया
काना फूसी चलने लगी
"लगता भले घर का लगता हे भाई
कुछ मज़बूरी रही होगी"

अमबुलंस बुला दो कोई
भीड़ मे से एक आवाज़ आयी
"चलो,चलो,पुलिस केस हे
२०वि मंज़िल से छलांग हे लगाई"

भीड़ की फुसफुसाहट मे
उसकी आहे दब सी गयी
जब तक अमबुलंस आयी
साँसे थम थी गयी

एक क्षण के ग़ुस्से में
एक गलती उसने की
दूसरे पल के किस्से में
गलती औरों से हो गयी

एक बहते भाव की रवानी मे
एक और जिन्दगी फना हो गयी.......

Saturday, September 22, 2007

नया जहाँ

आओ एक नया जहाँ बसाए
इक दूजे में हम समां जाये

अब दुनिया से मन भर गया हे

कुछ सपनो की दीवारे बनाए
हसीं खयालों से उन्हें सजाए

ईंट पत्थर से ना हो वास्ता

आओ कुछ मिटटी गारा ले आये
कुछ तुमसा कुछ मुझसा बनाए

अब खिलोने से दिल भर गया

आओ कहीँ दूर निकल जाये
शांति और अमन को अपनाए

ख़ून खराबे से हो किसका भला

Friday, September 14, 2007

कुछ त्रिवेनियाँ .......

धीमी सी हैं साँसें मेरी
बहुत तेज़ पर रफ़्तार तेरी

ए मौत तू जीतेगी जंग आज......
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ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त का बाज़ार है गरम साहिब
हुस्न,इश्क़ और जज़्बात बहुत बिकते हैं यहाँ

वफ़ा और क़ुर्बानी की क़ीमत पर है बहुत कम....
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जोड़ के रक्खा था जिसने सबको
तागा वो आज पर चटक हीगया

टूटे टुकड़े ज़ख़्म छोड़ गये गहरे......
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जादूगर ज़ो छू मंतर बोलेगा
दिखते को ग़ायब कर देगा

नफ़रत करे फ़ना तो शफा मानू ........
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मा के पल्लू में छुपा करती थी जो कल् तक
आज शर्मा के अपने आँचल में सिमटी बैठी है

पराया धन है ज़ो ले जाएँगे डोली में कहार.......
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