Wednesday, September 05, 2007

कांच के रिश्ते

कुछ कच्चे घरोंदो को
जब शक्ल देनी चाही
तो हाथ खुद ब खुद ही
मिटटी में सन् गए हैं

कोशिश हमारी ये थी
की हो जाये चराग रोशन
दिया बाती की जलती लौ ने
दमन फकत किये हैं

दूजे के कांधे
को हम
दीवार
तो हे समझे
पर औरों की क्या परवा
उनको पडे ज़रूरत
तो आँचल में अपने छुप कर
आगे निकल रहे हैं

हमने तो सिर्फ था चाहा
एक नेक काम करना
शर्मिंदगी से हम ही
खुद मे सिमट रहे हैं

हे कांच के सब रिश्ते
पल भर में चिट्कते हे

ऐसी फकत ही दुनिया
ऐसे फकत हे नाते
क्या कहे क्या सुने हम
सम् मौन अब रखते हैं

7 comments:

Yatish Jain said...

"हे कांच के सब रिश्ते
पल भर में चिट्कते हे"

यही सच है

Rachna Singh said...

good poetry good expression

Udan Tashtari said...

ऐसी फकत ही दुनिया
ऐसे फकत हे नाते
क्या कहे क्या सुने हम
सम् मौन अब रखते हैं
--

यही बेहतर है. अच्छे भाव.

Saurav Arya said...

रिश्ते टुट्ते नही , सिर्फ़ बदलते है,
साथ छुटने पर , है ये कैसा गम तुम्हे??
ताउम्र अकेले ही तो हम चलते हैं

:)

deepanjali said...

आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

Arimardan Kumar Tripathi said...

Very good effort.

Arimardan Kumar Tripathi said...

Very good effort.